लेखनी प्रतियोगिता -17-Jan-2023
राग की आकाश गंगा
नग जड़े कंगन तुम्हारे,
मोक्ष से ज्यादा ललित है
प्रीत के बंधन तुम्हारे
दीप जैसे तुम रखे थे
प्रेम की शुभ अल्पना पर
इक उजाला झर रहा था
नेह की परिकल्पना पर
खुद को कमतर लग रही थी
प्रेम की प्रचलित कथाएं
डाह से जलने लगी थी
स्वर्ग की सब अप्सराएं
एक तुम,और हर हृदय में
भाव लब्धि के खिले थे।
किंतु सबके राशिफल
सौभाग्य से खाली मिले थे
रात के पहले पहर में
नैन में इक प्रात थामे
चल रही थी साथ में जब
तुम हमारा हाथ थामे।
था बड़ा विस्मित अचंभित
उस सभा में जो रहा था।
दिव्य छवि लखकर तुम्हारी
काम कुंठित हो रहा था।।
Renu
18-Jan-2023 10:32 AM
👍🌺
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Mahendra Bhatt
18-Jan-2023 09:19 AM
👏👌
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Abhinav ji
18-Jan-2023 08:11 AM
Very nice
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